शनिवार, 26 दिसंबर 2015

हवा के तेज़ थपेड़ों में जीने मरने का


हवा के तेज़ थपेड़ों में जीने मरने का
है खूब तज़्रबा ये कर्ब से गुज़रने का

जाने कौन से रस्ते में था तमाम सफर
मिला मौका किसी मोड़ पर ठहरने का

खुशी तलाशते गुजरी है मेरी उम्र तमाम
मेरा तो काम ही है इंतज़ार करने का


टिक सका कभी मौसम के सामने कोई
सबब ये भी था मेरे टूटने बिखरने का

बुझी-बुझी हुई बेआस नज़रों से हर शाम
नज़ारा देखता हूँ रात के उभरने का

है लफ़्ज़-लफ़्ज़ शराबोर जज़्बा--दिल से
वरक़ पे उतरा हो जैसे, बहाव झरने का

भला मैं मौजो-तलातुम से कैसे लड़ताशकूर
था वाकिया मेरी कश्ती में पानी भरने का

बुधवार, 11 नवंबर 2015

ओढ़े ख़ुलूस वो कारे वफ़ा में लगा रहा

ओढ़े ख़ुलूस वो कारे वफ़ा में लगा रहा
पर खूँ का दाग़ उसकी क़बा में लगा रहा

सारा ज़माना हँसता रहा उसपे और वो
चुपचाप दूसरों पे दया में लगा रहा

आई बहार और यहाँ से गुज़र गई
वो सिर्फ़ इंतज़ारे सबा में लगा रहा

कोई जवाब लौटके उसको मिला नहीं
लेकिन वो नामुराद निदा में लगा रहा

अपना वजूद तक  उसे याद आया गाह
जब तक वो इक सियासी सभा में लगा रहा

ख़ुलूस- निष्कपटताकबा- लबादा
सबा- सवेरे की हवानिदा- आवाज़ देना

वजूद- अस्तित्व

मंगलवार, 22 सितंबर 2015

नैतिकता की गिनती होती है सामानों में

नैतिकता की गिनती होती है सामानों में
व्यापार बना है अब रिश्ता हम इंसानों में

सिमट गई सारी दुनिया मोबाइल में लेकिन
बढ़ गई दूरी घर के बैठक औ’ दालानों में

छो़ड़ धरा उड़नेवालों याद रहे तुमको ये
शाख नहीं होती सुस्ताने को अस्मानों में

आकांक्षायें भूल गईं हैं रिश्तों को अब तो
स्वार्थ छुपा दिखता है लोगों की मुस्कानों में

मादा जिस्मों को तकती आवारा नज़रों को
धर्मों के रक्षक रक्खेंगे किन पैमानों में

अपनी ओछी नज़रों को ढांके पहले तो वो
जो दोष निकाले है नारी के परिधानों में

तज़्किरा तेरा हुआ ज़ाहिर मेरा अरमाँ हुआ

तज़्किरा तेरा हुआ ज़ाहिर मेरा अरमाँ हुआ
नज़्र तुझको ये ग़ज़ल इसका तू ही उन्वाँ हुआ

रौनकें महफिल की तेरे हुस्न से थी दिलनशीं
बज़्म से तू क्या गई मौसम यहाँ वीराँ हुआ

बेरुखी ने यूँ किया दिल चाक मेरा बार-बार
तू कहे मासूमियत से क्या तुझे नादाँ हुआ

बात दिल की थी कही, दुश्वारियाँ बढ़ने लगी
राहे-गुल था हर कदम हर गाम वो पैकाँ हुआ

कल तलक तो पास मेरे वज्ह कोई भी न थी
अब तसव्वुर तेरा मेरे जीने का सामाँ हुआ