हवा के तेज़ थपेड़ों में जीने मरने का
है खूब तज़्रबा ये कर्ब से गुज़रने का
न जाने कौन से रस्ते में था तमाम सफर
मिला न मौका किसी मोड़ पर ठहरने का
खुशी तलाशते गुजरी है मेरी उम्र तमाम
मेरा
तो काम ही है इंतज़ार करने का
न टिक सका कभी मौसम के सामने कोई
सबब ये भी था मेरे टूटने बिखरने का
बुझी-बुझी हुई बेआस नज़रों से हर शाम
नज़ारा देखता हूँ रात के उभरने का
है लफ़्ज़-लफ़्ज़ शराबोर जज़्बा-ए-दिल से
वरक़ पे उतरा हो जैसे, बहाव झरने का
भला मैं मौजो-तलातुम से कैसे लड़ता ‘शकूर’
था वाकिया मेरी कश्ती में पानी भरने का