
आप अपने काम को तय
से थोड़ा ज़्यादा समय देते हैं तो सिर्फ अपनी कंपनी का नहीं अपना भला भी कर रहे
होते हैं। मान लीजिए आप सेल्स में हैं, रोज़ कम से कम 10 कस्टमर या क्लाइंट से
मिलते हैं, उस वक्त आप कंपनी के पर्याय होते हैं। यदि आपके संबंध अपने क्लाइंट से
मजबूत होते हैं तो ये आपकी सफलता है क्योंकि वो कंपनी की नहीं आपकी मेहनत की वज्ह
से आपसे जुड़ता है. भविष्य में यही संबंध ही काम आता है क्योंकि कौन? कब? कहाँ?
काम आ जाए कहा नहीं जा सकता। आपको जिस काम के लिए रखा गया है अगर वही करेंगे तो
आपको उतना ही मिलेगा जितना आप कर रहे हैं। आप यदि कुछ अतिरिक्त की उम्मीद करते हैं
कंपनी भी आपसे कुछ न कुछ अतिरिक्त की उम्मीद करती है। इससे कंपनी को जो फायदा होना
होगा वो तो होगा ही लेकिन आपको उससे ज़्यादा फायदा होगा। आज समस्या एम्प्यलॉमेंट
से ज़्यादा एम्प्लॉयबिलिटी की है, आप में जितना ज़्यादा हुनर होगा, आप कंपनी के
लिए उतने फायदेमंद साबित होंगे; जितने फायदेमंद आप कंपनी के लिए होंगे उतना ही
आपका भी भला होगा।
ये बात ज़रूर ध्यान
में रहे कि आप कितना काम कर रहे हैं ये महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि महत्वपूर्ण ये है
कि आपके कामों का कितना सकारात्मक नतीजा नज़र आ रहा है।
कभी कंज़र्वेटिव सोच
न रखें क्योंकि ये आपकी तरक्की के रास्ते को अवरूद्ध कर देता है। अपने सीमित दायरे
से बाहर निकलें और रोज़ थोड़ा अतिरिक्त सफर तय करें। कोई यदि आपको रोकता है तो ये
ज़रूर गौर कीजिएगा, उसने या तो अपना सफर तय कर लिया है और ये नहीं चाहता कि आप
उसके मुकाम तक पहँचें या फिर वो आपका प्रतिस्पर्धी है जो आप पर मनोवैज्ञानिक तरीके
से हावी होने की कोशिश कर रहा है। प्रतिस्पर्धी दुनिया में आगे रहना है तो अपने
कम्फर्ट ज़ोन से बाहर निकलें खुद को थोड़ा स्ट्रेच करें।










