याद ऐ ग़म तेरी न आनी थी
खुशनुमा सी वो ज़िन्दगानी थी
एक एहसास था मुकद्दस
वो
वस्ल की इक घड़ी
सुहानी थी
फिर वो इंसाँ परस्ती आगजनी
हर खबर में यही कहानी थी
मेरे फिरते ही भूल जाना था
क्या ये रस्मे वफ़ा निभानी थी
मुख़्तसर पल थे रंज के गुज़रे
हाँ, वो भी एक
चीज़ फ़ानी थी
मुस्कुराहट के पीछे क्या था वो
क्या तेरी वज़्हे-बेज़बानी थी
ग़म पे मेरे तेरा मचल जाना
ये मुहब्बत की इक निशानी थी