ओढ़े ख़ुलूस वो कारे वफ़ा में लगा रहा
पर खूँ का दाग़ उसकी क़बा में लगा रहा
सारा ज़माना हँसता रहा उसपे और वो
चुपचाप दूसरों पे दया में लगा रहा
आई बहार और यहाँ से गुज़र गई
वो सिर्फ़ इंतज़ारे सबा में लगा रहा
कोई जवाब लौटके उसको मिला नहीं
लेकिन वो नामुराद निदा में लगा रहा
अपना वजूद तक न उसे याद आया गाह
जब तक वो इक सियासी सभा में लगा रहा
ख़ुलूस- निष्कपटता, कबा- लबादा
सबा- सवेरे की हवा, निदा- आवाज़ देना
वजूद- अस्तित्व