शनिवार, 26 दिसंबर 2015

हवा के तेज़ थपेड़ों में जीने मरने का


हवा के तेज़ थपेड़ों में जीने मरने का
है खूब तज़्रबा ये कर्ब से गुज़रने का

जाने कौन से रस्ते में था तमाम सफर
मिला मौका किसी मोड़ पर ठहरने का

खुशी तलाशते गुजरी है मेरी उम्र तमाम
मेरा तो काम ही है इंतज़ार करने का


टिक सका कभी मौसम के सामने कोई
सबब ये भी था मेरे टूटने बिखरने का

बुझी-बुझी हुई बेआस नज़रों से हर शाम
नज़ारा देखता हूँ रात के उभरने का

है लफ़्ज़-लफ़्ज़ शराबोर जज़्बा--दिल से
वरक़ पे उतरा हो जैसे, बहाव झरने का

भला मैं मौजो-तलातुम से कैसे लड़ताशकूर
था वाकिया मेरी कश्ती में पानी भरने का