बुधवार, 7 सितंबर 2016

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छत्तीसगढ़ सरकार के अतंर्गत "अतिरिक्त कमिश्नर- विकास" के रूप में पदस्थ आदरणीय श्री सुभाष मिश्रा जी को अपनी किताब "ज़िन्दगी के साथ चलकर देखिये" भेंट करते हुए। श्री सुभाष मिश्रा जी थियेटर में भी सक्रिय हैं

बुधवार, 31 अगस्त 2016

जॉब और कैरियर 5: खुद को थोड़ा स्ट्रेच करें



















































आप अपने काम को तय से थोड़ा ज़्यादा समय देते हैं तो सिर्फ अपनी कंपनी का नहीं अपना भला भी कर रहे होते हैं। मान लीजिए आप सेल्स में हैं, रोज़ कम से कम 10 कस्टमर या क्लाइंट से मिलते हैं, उस वक्त आप कंपनी के पर्याय होते हैं। यदि आपके संबंध अपने क्लाइंट से मजबूत होते हैं तो ये आपकी सफलता है क्योंकि वो कंपनी की नहीं आपकी मेहनत की वज्ह से आपसे जुड़ता है. भविष्य में यही संबंध ही काम आता है क्योंकि कौन? कब? कहाँ? काम आ जाए कहा नहीं जा सकता। आपको जिस काम के लिए रखा गया है अगर वही करेंगे तो आपको उतना ही मिलेगा जितना आप कर रहे हैं। आप यदि कुछ अतिरिक्त की उम्मीद करते हैं कंपनी भी आपसे कुछ न कुछ अतिरिक्त की उम्मीद करती है। इससे कंपनी को जो फायदा होना होगा वो तो होगा ही लेकिन आपको उससे ज़्यादा फायदा होगा। आज समस्या एम्प्यलॉमेंट से ज़्यादा एम्प्लॉयबिलिटी की है, आप में जितना ज़्यादा हुनर होगा, आप कंपनी के लिए उतने फायदेमंद साबित होंगे; जितने फायदेमंद आप कंपनी के लिए होंगे उतना ही आपका भी भला होगा।
ये बात ज़रूर ध्यान में रहे कि आप कितना काम कर रहे हैं ये महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि महत्वपूर्ण ये है कि आपके कामों का कितना सकारात्मक नतीजा नज़र आ रहा है।

कभी कंज़र्वेटिव सोच न रखें क्योंकि ये आपकी तरक्की के रास्ते को अवरूद्ध कर देता है। अपने सीमित दायरे से बाहर निकलें और रोज़ थोड़ा अतिरिक्त सफर तय करें। कोई यदि आपको रोकता है तो ये ज़रूर गौर कीजिएगा, उसने या तो अपना सफर तय कर लिया है और ये नहीं चाहता कि आप उसके मुकाम तक पहँचें या फिर वो आपका प्रतिस्पर्धी है जो आप पर मनोवैज्ञानिक तरीके से हावी होने की कोशिश कर रहा है। प्रतिस्पर्धी दुनिया में आगे रहना है तो अपने कम्फर्ट ज़ोन से बाहर निकलें खुद को थोड़ा स्ट्रेच करें।






सोमवार, 29 अगस्त 2016

जॉब और कैरियर 4: अप्रत्याशित




























अप्रत्याशित यानि वो घटना जिसके बारे में पहले से कल्पना या अपेक्षा न की गई हो। क्या ऐसा हो सकता है? कोई घटना अक्सर तभी अप्रत्याशित होती है, जब हम मान कर चलते हैं ये हमारे साथ नहीं हो सकता। संसार के आकार को देखते हुए हम हर घटना का अंदाजा पहले से नहीं लगा सकते, इसलिए कोई घटना अप्रत्याशित हो सकती है।
क्या प्रोफेशनल ज़िन्दगी में कोई घटना अप्रत्याशित हो सकती है?
हाँ हो सकती है, ज़्यादातर लोगों का यही मानना है मगर मेरा विचार कुछ अलग है; कम से कम प्रोफ़ेशनल ज़िन्दगी में अप्रत्याशित कुछ नहीं होता है। क्यों! चलिए पता करते हैं।
अक्सर अध्ययन काल में हमें सही दिशा या मार्गदर्शन नहीं मिलता या पढ़ाई के मामले औसत छात्र होते हैं तो हम अपने भविष्य की राह तय नहीं कर पाते और एक अदद नौकरी की तलाश में जुट जाते हैं ताकि कमाई का साधन उपलब्ध हो जिससे जीवन-यापन सुनिश्चित किया जा सके। हमें अपने कैरियर के बारे में सोचने का दूसरा मौका तब मिलता है जब हमें पहली नौकरी मिलती है। तब हमें ये रिसर्च करना चाहिए कि जहाँ हम नौकरी कर रहे हैं वहाँ अपने लिए अवसर किस तरह बना सकते हैं, हमारे सामने आने वाली विपरीत परिस्थितियाँ क्या-क्या हो सकती है और इससे कैसे निपट सकते हैं।
जब हम सिर्फ जॉब कर रहे होते हैं तो परिस्थितियों का सही व ज़रूरी आकलन नहीं करते बस बहाव के साथ बहते चले जाते हैं, इस तरह हम आगामी परिस्थितियों के लिए तैयार नहीं होते। अब हम अपने प्रश्न पर फिर आते हैं, क्या प्रोफेशनल ज़िन्दगी में कोई घटना अप्रत्याशित हो सकती है? अगर आप सिर्फ जॉब कर रहे होतें है तो हाँ आपके साथ अप्रत्याशित हो सकता है क्योंकि आप आगामी परिस्थितियों के लिए तैयार नहीं हैं, यदि आप कैरियर के बारे में सोचते हैं तो आपके साथ अप्रत्याशित नहीं होता क्योंकि आप पहले से तैयार हैं। थोड़ी सी कोशिशों के बाद आपको पहली नौकरी तो मिल जाएगी पर चुनौतियाँ इसके बाद आती हैं। याद रखिये तकलीफें हर हाल में आनी ही है, आपको हर परिस्थिति के लिए तैयार रहना ही पड़ेगा।

शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

जॉब और कैरियर-3: आखिर कब



ज़रा इस किस्से को पढ़ें फिर आगे बढ़ें-

आपके जेह्न में अक्सर ये प्रश्न आता होगा, आखिर कब?  कैरियर निर्माण की योजना बनाने का सही समय कौन सा है? फ़िरोज़ की कहानी से आपको भी पता चल गया होगा कि कैरियर प्लानिंग अध्ययन काल से ही शुरू हो जाती है, जहाँ जागरूक विद्यार्थी सबसे पहले अपनी रूचि के अनुसार विषय चुनकर कैरियर की तैयारी शुरू कर चुके होते हैं, फिर योजना बनाकर अपने अंदर क्षमता तथा योग्यता विकसित करते हैं।
यहाँ यह कहना ज़रूरी होगा कि दोस्तों और रिश्तेदारों के ताने, कमज़ोर आर्थिक स्थिति, रिश्तेदारों द्वारा कदम-कदम पर रो़ड़े अटकाना उस पर उच्च शिक्षा सुविधाओं का अभाव; ये तमाम परिस्थितियाँ हिम्मत तोड़ने के लिए काफी हैं। इन सबके बावजूद फिरोज़ ने महज जॉब को नहीं बल्कि कैरियर को तरजीह दी। वही कैरियर जिसकी योजना उसने तभी बना ली थी जब वो 10 वीं में था इसलिए उसने अपने लक्ष्य के अनुसार विषय का चुनाव किया था।
कैरियर प्लानिंग का दूसरा समय तब आता है जब आपको नौकरी मिलती है। तब आप काम की ज़रूरतों के मुताबिक अपने अंदर क्षमता तथा योग्यता विकसित कर कैरियर प्लान कर सकते हैं।
काम शुरू करने के बाद निम्नलिखित बातों का अध्ययन(Study) तथा विश्लेषण(Analysis) करें तो आगे मुश्किल परिस्थितियों में आप बेहतर निर्णय ले पाएँ 

  1.  आप जिस कम्पनी में काम कर रहे हैं वहाँ आपके लिए क्या-क्या अवसर हैं
  2.  आप जिस क्षेत्र या उद्योग में काम कर रहे हैं वहाँ आपके लिए अवसर क्या-क्या हैं
  3.   आपके सामने परिस्थितियाँ क्या-क्या आ सकती हैं
  4.    आपके साथ बुरे से बुरा क्या हो सकता है और आप उससे कैसे निपट सकते हैं 
  5.    आप अपने आपको कैसे अपग्रेड कर सकते हैं 
   अपने बारे में आपको ही सोचना पड़ेगा कोई और नहीं सोचेगा

गुरुवार, 25 अगस्त 2016

जॉब और कैरियर-2: अपनी इच्छा अपनी राहें

अपने रास्ते खुद ही बनाएँ, जहाँ तक हो सके किसी और ताक़त के हाथ में अपनी किस्मत को न जाने दें। ज़रा इन दो परिस्थितियों पर नज़र डालते हैं-





ज़ाहिर है शुरू में रंजीव और रघुनाथ भी नाकाम लोगों में से ही थे क्योंकि दोनों ही मजबूरीवश इस प्रोफेशन में आए थे, लेकिन बाद में रंजीव नाकाम नहीं रहा। यदि हम सिर्फ पैसा कमाने के उद्देश्य से काम करते हैं तो हम सिर्फ नौकरी कर रहे होते हैं। यहाँ आपका काम आपकी योग्यता, क्षमता या रूचि के अनुरूप हो ये ज़रूरी नहीं है; इसके विपरीत, जहाँ कैरियर की बात आती है, वहाँ परिस्थितियाँ अलग हो जाती हैं। तब हम वो काम करते हैं जहाँ पैसे तो कमा रहे होते हैं साथ ही हमारा जॉब प्रोफाइल हमारी रूचि, क्षमता तथा योग्यता के अनुरूप होता है या हमारी इच्छा शक्ति उसे हमारे अनुरूप बना देती है। तब हम सिर्फ नौकरी नहीं कर रहे होते हैं बल्कि ज़िन्दगी अपने मुताबिक जी रहे होते हैं। इस तरह हमारी जीवन-शैली लगातार बेहतर और बेहतर होती जाती है, हमारा मन उत्साहित रहता है। हम तन और मन से ज़िन्दगी का लुत्फ़ उठा रहे होते हैं, यही कैरियर है। यदि हम केवल नौकरी करते हैं तो परिस्थितियों के अधीन हो जाते हैं, वो जैसा चलाए चलना हमारी मजबूरी हो जाती है। हमारा जीवन स्तर ऊँचा उठने की बजाए एक जगह ठहर जाता है; आखिर हम कुंठाग्रस्त हो जाते हैं। कैरियर, जॉब से आगे शुरू होता है। उपरोक्त परिस्थितियों का आकलन करने के बाद हम इस नतीजे पर पहुँच सकते हैं कि पहली नौकरी मिलने के बाद रंजीव ने कैरियर बनाने का सोचा, आज वो विपरीत परिस्थितियों में भी मजबूती से खड़ा रह सकता है जबकि सिर्फ जॉब करना तथा कम्फर्ट ज़ोन में रहने की आदत रघुनाथ को भारी पड़ी।

सोमवार, 22 अगस्त 2016

जॉब या कैरियर-1


जॉब और कैरियरएक समान लगने वाले दो शब्द कई-कई अर्थों में अलग होते हैं। हमें जीने के लिए पैसों की ज़रूरत होती है और पैसा कमाने के लिए काम करना पड़ता है। जॉब और कैरियर में फर्क़ इसके बाद आता है। फार्मास्युटिकल सेल्स तथा मार्केटिंग के 14 वर्षीय सफर में मुझे जितने भी लोग मिले उनमें से ज़्यादातर नाकाम लोग थे। मेरी बात अटपटी लग सकती है या फार्मा से जुड़े साथियों को बुरा भी लग सकता है, लेकिन सच्चाई यही है; स्वयं को गिनते हुए मैं जितने लोगों से मिला उनमें से किसी का लक्ष्य नहीं था कि वो सेल्स में आए या फार्मा इंडस्ट्री में काम करे। सभी ने अध्ययन काल में कुछ और सोचकर रखा था मगर परिस्थितियाँ उनके पक्ष में नहीं थी, उनमें अधिकांश लोगों का कहना था कि कोई और काम नहीं मिल सकता था इसलिए यहाँ काम कर रहे हैं। इस लिहाज से ये नाकाम थे। जिसने अपना नज़रिया यहाँ से बदला वो फिर नाकाम नहीं रहा। जॉब और कैरियर के बीच नज़रिये में फ़र्क ज़िन्दगी में बहुत बड़ा परिवर्तन ला देता है। ये सिर्फ फार्मास्यूटिकल इंडस्ट्री की बात नहीं है, कई ऐसी नौकरियाँ, कई ऐसे उद्योग होते हैं जहाँ लोग कोई दूसरा विकल्प न होने पर आते हैं। इसके बाद अपनी ज़िन्दगी को बदलना खुद के ही हाथ में होता है।

रविवार, 14 फ़रवरी 2016

याद ऐ ग़म तेरी न आनी थी



याद ऐ ग़म तेरी न आनी थी
खुशनुमा सी वो ज़िन्दगानी थी

एक एहसास था मुकद्दस वो
वस्ल की इक घड़ी सुहानी थी

फिर वो इंसाँ परस्ती आगजनी
हर खबर में यही कहानी थी

मेरे फिरते  ही भूल जाना था
क्या ये रस्मे वफ़ा निभानी थी

मुख़्तसर पल थे रंज के गुज़रे
हाँ, वो भी एक चीज़ फ़ानी थी

मुस्कुराहट के पीछे क्या था वो
क्या तेरी वज़्हे-बेज़बानी थी

ग़म पे मेरे तेरा मचल जाना
ये मुहब्बत की इक निशानी थी