मंगलवार, 22 सितंबर 2015

नैतिकता की गिनती होती है सामानों में

नैतिकता की गिनती होती है सामानों में
व्यापार बना है अब रिश्ता हम इंसानों में

सिमट गई सारी दुनिया मोबाइल में लेकिन
बढ़ गई दूरी घर के बैठक औ’ दालानों में

छो़ड़ धरा उड़नेवालों याद रहे तुमको ये
शाख नहीं होती सुस्ताने को अस्मानों में

आकांक्षायें भूल गईं हैं रिश्तों को अब तो
स्वार्थ छुपा दिखता है लोगों की मुस्कानों में

मादा जिस्मों को तकती आवारा नज़रों को
धर्मों के रक्षक रक्खेंगे किन पैमानों में

अपनी ओछी नज़रों को ढांके पहले तो वो
जो दोष निकाले है नारी के परिधानों में

तज़्किरा तेरा हुआ ज़ाहिर मेरा अरमाँ हुआ

तज़्किरा तेरा हुआ ज़ाहिर मेरा अरमाँ हुआ
नज़्र तुझको ये ग़ज़ल इसका तू ही उन्वाँ हुआ

रौनकें महफिल की तेरे हुस्न से थी दिलनशीं
बज़्म से तू क्या गई मौसम यहाँ वीराँ हुआ

बेरुखी ने यूँ किया दिल चाक मेरा बार-बार
तू कहे मासूमियत से क्या तुझे नादाँ हुआ

बात दिल की थी कही, दुश्वारियाँ बढ़ने लगी
राहे-गुल था हर कदम हर गाम वो पैकाँ हुआ

कल तलक तो पास मेरे वज्ह कोई भी न थी
अब तसव्वुर तेरा मेरे जीने का सामाँ हुआ