अपने रास्ते खुद ही बनाएँ, जहाँ तक हो सके किसी
और ताक़त के हाथ में अपनी किस्मत को न जाने दें। ज़रा इन दो परिस्थितियों पर नज़र
डालते हैं-


ज़ाहिर है शुरू में रंजीव
और रघुनाथ भी नाकाम लोगों में से ही थे क्योंकि दोनों ही मजबूरीवश इस प्रोफेशन में
आए थे, लेकिन बाद में रंजीव नाकाम नहीं रहा। यदि हम सिर्फ पैसा कमाने के उद्देश्य से काम करते हैं तो हम सिर्फ नौकरी कर
रहे होते हैं। यहाँ आपका काम आपकी योग्यता, क्षमता या रूचि के अनुरूप हो ये ज़रूरी
नहीं है; इसके विपरीत, जहाँ कैरियर की बात आती है, वहाँ परिस्थितियाँ अलग हो जाती
हैं। तब हम वो काम करते हैं जहाँ पैसे तो कमा रहे होते हैं साथ ही हमारा जॉब
प्रोफाइल हमारी रूचि, क्षमता तथा योग्यता के अनुरूप होता है या हमारी इच्छा शक्ति
उसे हमारे अनुरूप बना देती है। तब हम सिर्फ नौकरी नहीं कर रहे होते हैं बल्कि
ज़िन्दगी अपने मुताबिक जी रहे होते हैं। इस तरह हमारी जीवन-शैली लगातार बेहतर और
बेहतर होती जाती है, हमारा मन उत्साहित रहता है। हम तन और मन से ज़िन्दगी का
लुत्फ़ उठा रहे होते हैं, यही कैरियर है। यदि हम केवल नौकरी करते हैं तो
परिस्थितियों के अधीन हो जाते हैं, वो जैसा चलाए चलना हमारी मजबूरी हो जाती है।
हमारा जीवन स्तर ऊँचा उठने की बजाए एक जगह ठहर जाता है; आखिर हम कुंठाग्रस्त हो
जाते हैं। कैरियर, जॉब से आगे शुरू होता है। उपरोक्त परिस्थितियों का आकलन करने के
बाद हम इस नतीजे पर पहुँच सकते हैं कि पहली नौकरी मिलने के बाद रंजीव ने कैरियर
बनाने का सोचा, आज वो विपरीत परिस्थितियों में भी मजबूती से खड़ा रह सकता है जबकि
सिर्फ जॉब करना तथा कम्फर्ट ज़ोन में रहने की आदत रघुनाथ को भारी पड़ी।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें